Operations Conducted by the Mossad in Hindi - The Secret History of Mossad in Hindi

मोसाद : दुनिया की सबसे खतरनाक ख़ुफ़िया एजेंसी | जाने इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी के 6 खतरनाक मिशन के बारे में

"मोसाद" किस बला का नाम है यह तो शायद दुनिया के हर देश और देशवासियों को पता होगा. यह इजराइल की एक ख़ुफ़िया एजेंसी है जिसको दुनिया की सबसे खतरनाक ख़ुफ़िया एजेंसी का ख़िताब मिल चुका है. इजराइल के जन्म के  सिर्फ 68 साल ही हुए है, ऐसे में यह देश ने मोसाद की मदद से कई सारे ऐसे खतरनाक मिशन - Operations Conducted by the Mossad in Hindi किए है. इसके बारे में जानकर आपको लगेगा की इस खतरनाक ख़ुफ़िया एजेंसी के पास नामुमकिन नामक कोई शब्द हे ही नहीं.

चलिए ज्यादा समय ना गवाते हुए आर्टिकल की और आगे बढ़ते है क्योंकि आज का आर्टिकल थोड़ा लम्बा होने वाला है But I am Sure आपको The Secret History of Mossad in Hindi आर्टिकल पढ़ ने में बहुत ही रोमांचक अनुभव होने वाला है. क्योंकि इसके अन्दर में आपको कैसे इजराइल और मोसाद का जन्म हुआ और कैसे मोसाद : दुनिया की सबसे खतरनाक ख़ुफ़िया एजेंसी बनी? और साथ ही मोसाद के 6 खतरनाक मिशन के बारे में में भी बताने वाला हुं.

चलिए जानते है मोसाद : दुनिया की सबसे खतरनाक ख़ुफ़िया एजेंसी | जाने इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी के 6 खतरनाक मिशन के बारे में आर्टिकल में कौन से मुद्दों पर हम बात करने वाले है.

1. इजराइल का इतिहास - History and Creation of Israel in Hindi
2. मोसाद का जन्म और पहला मिशन -  Creation of Mossad
3. नाजी हत्याकांड के आरोपी अडोल्फ आइश्मन का अपहरण
4. इजराइल - अरब युद्ध, 5 जून 1967 - The Six Days War
5. म्यूनिख नरसंहार, 5 सितम्बर 1972 - Black September
6. इम्पॉसिबल कमांडो मिशन, 27 जून 1976 - Operation Thunderbolt
7. ऑपरेशन ओपेरा, 7 जून 1981 - Operation Babylon or Operation Opera

चलिए अब जानते है सभी के बारे में विस्तार से.

Operations Conducted by the Mossad in Hindi - The Secret History of Mossad in Hindi

इजराइल का इतिहास - History and Creation of Israel in Hindi
इजराइल यहूदी धर्म के लोगो का एक नया राष्ट्र है. इससे पहले यहूदियों के पास अपना कोई भी ठिकाना नहीं था. यहूदियों के धर्मग्रंथ के अनुसार यहूदी जाती का निकास पैगंबरहजरत अब्राहम से शुरू होता है. अब्राहम के बेटे का नाम इसहाक और इसहाक के बेटे का नाम याकूब था. इसी याकूब का दूसरा नाम था इसरायल.

इस याकूब का एक बेटा था जिसका नाम था यहूद और इसी के नाम से आगे चलकर इसके वंशजो यहूदी के नाम से पहचाने लगे. बाद में यहूदी धर्म के सभी लोगो के राष्ट्र का नाम इजराइल पड़ा और धर्म का नाम यहूदी रखा गया.

अब्राहम के बाद यहूदी धर्म का सबसे बड़ा नाम मूसा यानि की मोजेस का आता है. इसी मोजेस ने अलग-अलग जगह में बटे हुए यहूदियों को एक किया और उनको 10 कमांडमेंट्स (Commandments) कहे जिस पर यहूदियों का धर्म खड़ा है.

वैसे तो यहूदियों का इतिहास करीब 4 हजार साल पुराना है इसीलिए हम इसके बारे में ज्यादा बात नहीं करते है. मोजेस के समय से इजराइल के निर्माण तक बहुत तर्रिके से लोगो ने यहूदियों को पीड़ित किया जिसमे World War 1 और World War 2 भी सामिल है.

यहूदी लोग कई सालों से अपने राष्ट्र के लिए संघर्ष कर रहे थे. आखिर वो दिन भी आ गया जब उनको उनका देश मिलने वाला था. बात है सन 1917 की जब ब्रिटन के विदेशमंत्री आर्थर बल्फर  ने पेलेस्टाइन प्रदेश का कुछ हिस्सा काट कर यहूदियों के देने के लिए सांसद में बात की और सभी लोग मान गए. दिक्कत यह थी की इस जगह पर आरब लोग निवास करते थे और उनको यह बात बिलकुल भी मंज़ूर नहीं थी की यह जगह यहूदियों को दे दी जाए. इसी वजह से आरब लोगो ने हर जगह पर बड़े पैमाने में दंगे शुरू कर दिए.

यह संघर्ष कई सालों तक चलता रहा, धीरे-धीरे इसमें आसपास के सभी आरब देश जुड़ गए. एसी स्थिति में 14 May 1948 में यहूदियों को अपना राष्ट मिला जिसका नाम इजराइल रखा गया. इसकी स्थापना इजराइल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन (David Ben Gurion) की थी.

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मोसाद का जन्म और पहला मिशन -  Creation of Mossad
अभी इजराइल को राष्ट्र के रूप में घोषित किए हुए 30 मिनट ही हुई थी की अचानक उस छोटे से देश पर इजिप्त की वायुसेना ने हमला कर दिया. इसके दूसरे ही दिन इजिप्त के 10 हजार से भी ज्यादा सैनिक इजराइल की सीमा की और आगे बढ़ने लगे. दूसरी और से जॉर्डन ने अपने 4500 सैनिक से इजराइल पर चढ़ाई कर दी. इसके बाद इराक, सीरिया और लेबनान ने भी 9 हजार से ज्यादा सैनिक को इजराइल पर हमला करने के लिए भेज दिया.

कुल मिलाकर 5 आरब देशों ने नए जन्मे हुए इजराइल पर चारों और से हमला कर दिया. इस वक्त इजराइल के पास सिर्फ 29, 680 ही सैनिक थे जिनके पास सिर्फ नोर्मल मशीनगन ही थी. वही दूसरी और उनके दुश्मनों के पास 152 टैंक थी. इस वक्त में रूस सहित किसी भी देश इजराइल की मदद करना नहीं चाहता था. 

अब इजराइल के पास सिर्फ दो ही रास्ते बचे थे या तो वो एक बार फिर से ग़ुलाम बन जाए या खुनी खेल खेलकर सभी देशों को मार भगाए. उस वक्त इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी जिसका नाम था "शिन बेत" (Shin Bet) ने अपना पहला मिशन शुरू किया. दूसरे देश में बसे सभी यहूदियों ने भी अपने देश के लिए पैसे का दान दिया जिसकी बदौलत 10 करोड़ डॉलर जमा हुए जिससे इजराइल ने 75 mm की 10 टैंक, 65 mm की 19 टैंक और कई सारा बारूद ख़रीदा. जिसकी मदद से इजराइल ने अकेले ही उन 5 आरब देशों के सामने युद्ध किया. यह युद्ध 1 साल 3 महिना और 10 दिन तक चला जिसमे इजराइल ने पेलेस्टाइन की 35 प्रतिसद भूमि पर अपना कब्ज़ा जमा लिया.

इस तरह  "शिन बेत" (Shin Bet) की मदद से इजराइल ने अपना पहला युद्ध आरबो के सामने जीता. इसके बाद 1 अप्रैल 1951 में इस ख़ुफ़िया एजेंसी का नाम "मोसाद" रखा गया जिसका मतलब होता है मौत. इस तरह मोसाद का जन्म हुआ.

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नाजी हत्याकांड के आरोपी अडोल्फ आइश्मन का अपहरण
बात है सन 1957 की जब इजराइल अपना 9 वाँ जन्मदिन मना रहा था. ऐसे ख़ुशी के माहौल पे भी एक निराशा छाई हुई थी. दरअसल वो आज भी दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान (सन 1939 से लेकर सन 1941) हुई यहूदियों की हत्या को नहीं भूल पाए थे. जिसमे हिटलर द्वारा स्थापित नाजी हुक़ूमत ने 60 लाख यहूदियों को गैस के चैम्बर में डाल कर ज़िन्दा दफ़न कर दिया था.

हिटलर तो चला गया था लेकिन इस कारनामे को अंजाम देने वाले लोग आज भी ज़िन्दा थे.वो सभी अपराधी ब्रिटन, अमेरिका, फ़्रांस जैसे देशों में जा छुपे थे. मोसाद ने हर जगह उन हत्यारों का पता लगाना शुरू कर दिया था लेकिन 12 साल से भी ज्यादा समय बीत चुका था फिर भी मोसाद के हाथ में कोई भी अपराधी नहीं आया था. जिसमे सबसे बड़ा नाम था अडोल्फ़ आइश्मन का. यह वही हत्यारा था जिसने 60 लाख यहूदियों को मारने का मोर्चा संभाला था. इन 60 लाख में 15 लाख तो मासूम बच्चे सामिल थे.

मोसाद ने दुनिया के सभी देश के कोने में अडोल्फ़ आइश्मन की खोज जारी रखी. आखिरकार मोसाद को पता चला की यह हत्यारा अर्जेंटीना में छुपा हुआ था. इस देश का सेना प्रमुख हिटलर को अपना हीरो समझता था और नाजी हत्याकांड के लोगो का समर्थन करता था. इसी वजह से मोसाद के लिए यह नामुमकिन था की वो अर्जेंटीना में जाए और अडोल्फ़ आइश्मन को बंदी बनाकर इजराइल ले आए. फिर भी मोसाद के कुछ लोग ख़ुफ़िया पहचान बनाकर  अर्जेंटीना के लिए रवाना हुए सबसे पहले 30 अप्रैल 1960 में इसर हेरल नामक एजेंट अर्जेंटीना पहुंचा और इसके बाद 3 मई 1960 में पीटर मेल्किन, आहरोन, मीर और उझी नामक एजेंट भी अपनी पहेचन छिपाकर अर्जेंटीना पहुंचे.

11 मई 1960 को अडोल्फ़ आइश्मन को पकड़ा और वही पर इसकी पूछताछ शुरू करदी जब यह पक्का हो गया की यही अडोल्फ़ आइश्मन है तब जाकर 23 मई 1960 में इजराइल के Britannia नामक प्लेन की मदद से इजराइल में लाया गया. इसके तुरंत ही बाद मोसाद के प्रमुख Ben Gurion ने खुलासा किया की हमने नाजी हत्यारे अडोल्फ़ आइश्मन को पकड़ लिया है. 

मोसाद के इस तरह के ख़ुफ़िया मिशन के कारण पूरी दुनिया हेरत में पड़ गई. अर्जेंटीना को तो जैसे बहुत ही बड़ा सदमा पहुंचा था क्योंकि उसको पता ही नहीं चला की कब मोसाद के ख़ुफ़िया एजेंट उनके देश में घुसे और कब वहाँ से अडोल्फ़ आइश्मन को ले गए. इस घटना के बाद पूरी दुनिया ने मोसाद की वाह-वाह करने लगी.

दो सालों तक इस पर मुकदमा चला और आखिरकार 31 मई 1962 में नाजी हत्याकांड के मुख्य आरोपी को फाँसी की सजा दी गई.

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इजराइल - अरब युद्ध, 5 जून 1967 - The Six Days War
The Six Days War नामक यह युद्ध की कहानी बहुत ही रोमांचक है. अब तक तो दुनिया मोसाद के ख़ुफ़िया तरीके से वाक़िफ़ हो गई थी लेकिन अब बारी थी सामने की लड़ाई की जीन मे एक छोटा सा इजराइल और उसके सामने थे 6 आरब देश.

वैसे यह युद्ध शुरू हुआ था 5 जून 1967 को, पर इस युद्ध से पहले ही इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद ने जून 1963 में ही अपना काम शुरू कर दिया था क्योंकि उनको पता था की आने वाले सालों में इन सभी देश के साथ युद्ध ज़रुर होगा. उन दिनों रूस इजराइल के कट्टर दुश्मन इराक, इजिप्त और सीरिया की बहुत ही मदद करता था. रूस को पता था की जल्द ही यह तीनों देश मिलकर इजराइल पर हमला करने वाले है इसी वजह से रूस ने सभी तीन देश को उस वक्त का सबसे खतरनाक मिग-21 नामक फाइटर प्लेन भी दिया. (यहाँ एक बात ध्यान देने की है की रूस को इजराइल से कोई जाती दुश्मनी नहीं थी, पर इजराइल और अमेरिका के बीच में दोस्ती थी इसी वजह से रूस इजराइल से खफा था.)

यदि युद्ध के दौरान मिग - 21 से इजराइल पर हमला होता है तो इजराइल की पराजय निश्चित थी और रूस इजराइल को मिग-21 देने वाला नहीं था. इसी वजह से मोसाद ने इराक में से मिग-21 की चोरी करने का फैसला किया. यह कोई छोटी बात नहीं थी. तीन-तीन दुश्मन देशों की सीमा पार करके एक और दुश्मन देश में जाकर उन्ही का मिग-21 चुरा ना था. लेकिन मोसाद के लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं था. मोसाद के एजेंट ने इराक में घुस कर अगस्त 1966 में मिग-21 चुरा लिया और इजराइल की ज़मीन पर लाके रख दिया. इस खबर से पूरी दुनिया हिल गई थी क्योंकि यह कोई गोल्ड या पैसे की चोरी नहीं थी लेकिन दुश्मन देश के घर में घुस कर उसी का हथियार चुराया गया था. अभी भी इराक, सीरिया और इजिप्त के पास 350 मिग-21 थे.

अब इजराइल को पता था की किसी भी वक्त यह 6 देश मिलकर हम पर हमला कर सकते है. सभी देशों की सेना जॉर्डन में आकार इजराइल के साथ युद्ध करने वाले थे. लेकिन कोई भी कुछ समझे इससे पहले ही इजराइल ने 5 जून 1967 में इजिप्त पर हमला करके उसके 400 fighter Plane को ज़मीन पर ही खत्म कर दिया. इस हमले के कारण सभी देश कमजोर पड़ने लगे और सिर्फ 6 ही दिन में हार मान कर वापिस चले गए.

6 दिन चले इस युद्ध में इजराइल के करीब 1000 सैनिक शहीद हुए लेकिन अरब देशों के 20 हजार से भी ज्यादा जवान शहीद हो गए थे. पूरी दुनिया इजराइल के इस कारनामे के कारन हैरान हो गई थी. बाकी देश समज गए थे की इजराइल को कभी भी छेड़ना नहीं है.

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म्यूनिख नरसंहार, 5 सितम्बर 1972 - Black September
म्यूनिख नरसंहार जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित ओलंपिक गेम के दौरान हुआ था. इस खेल के दौरान फिलिस्तीन के आतंकवादियों ने इजराइल के 11 खिलाड़ियों को बंधी बनाकर मौत के घाट उतर दिया था. यह हमला फिलिस्तीन आतंकवादियों के समूह ब्लैक सितम्बर ने किया था. यह हमला करने की वजह थी इजराइल में बंधक 234 आतंकवादियों को रिहा करवाना था.  लेकिन जब इजराइल ने उन Terrorist को छोड़ने की बात को स्वीकार नहीं, इजराइल मोसाद की मदद से ख़ुफ़िया तरीके से उन सभी को छुड़ा ने में लगा था लेकिन जर्मनी की वजह से उनको यह बात का पता चल गया जिसके कारन फिलिस्तीन के आतंकवादियों ने इजराइल के 11 खिलाड़ियों को मौत के घाट उतार दिया.

इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने सभी खिलाडियों के परिवार से बात की और कहाँ की हम इसका बदला ज़रुर लेंगे. 8 सितम्बर 1972 में इजराइल ने फिलिस्तीनी के सहयोगी सीरिया और लेबनान में स्थित 10  अड्डे को तबाह कर दिया और उसके 200 लोगों को मौत के घाट उतार दिया. अब बारी थी मोसाद की. मोसाद ने सन 1972 से 1988 तक दुनिया के हर कोने से इस घटना में जुड़े लोग और उनकी सहायता करने वाले सभी लोगो को मर गिराया. इस तरह मोसाद ने ब्लैक सितम्बर के समूह के सभी लोगो को मारकर अपना मिशन पूरा किया.

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असम्भव कमांडो मिशन, 27 जून 1976 - Operation Thunderbolt
27 जून 1976 को एयर फ़्रांस की फ्लाइट ए300 वी4-203 इजराइल के शहर तेल अवीव से ग्रीस की राजधानी एथेंस के लिए उड़ान भरी, जिसमे 246 मुसाफिर थे जिनमे ज्यादातर लोग इजराइल के नागरिक थे. जब यह प्लेन एथेंस पहुंचा तब इसमें 4 आतंकवादी भी सवार हो गए. प्लेन पेरिस के लिए रवाना हुआ  इन चार आतंकवादियों में 2 फिलिस्तीन के और दो जर्मन के रेवोल्यूशनरी सेल से जुड़े हुए थे.

रात को ठीक 12.30 बजे विमान के पायलट को हटाकर उस प्लेन को हाइजैक कर लेते है. इसके बाद इस प्लेन को पेरिस की बजाए युगांडा ले जाया गया. अब मामला बहुत भयानक हो गया था क्योंकि जहाँ पर प्लेन को हाइजैक करके उतारा गया था वहाँ का तानाशाह ईदी अमीन इन फिलिस्तीनी आतंकवादियों के समर्थन में खड़ा था.

घटना के 24 घंटो बाद उन आतंकवादियों ने इजराइल में क़ैद 40 फिलिस्तीनी आतंकवादियों को छुड़ाने की और 5 मिलियन डॉलर देने की बात रखी. इजराइल की सरकार को उनकी मांग पूरी करने के लिए सिर्फ 48 घंटे का समय दिया गया था. इसके बाद वो एक-एक करके सरे इसराइली नागरिकों को मार ने वाले थे. इजराइल की सरकार ने कहाँ की हम आपकी बात से सहमत है पर हमको कुछ हो वक्त दिया जाए. इसके बाद इजराइल को 3 और दिनों का वक्त दिया गया.

3 जुलाई 1976 को Operation Thunderbolt की शुरुआत होती है. वक्त बहुत ही कम था और जिस देश में प्लेन था वो खुद in आतंकवादियो की मदद कर रहा था, इसी लिए यह मिशन नामुमकिन था. युगांडा की एयर स्पेस में चोरी छुपे घुसना था. इजराइल के 4 कार्गो विमान के साथ 2 बोईंग 707 विमान ने भी उड़ान भरी. इजराइल के चारों कार्गो विमान बेहद ही नीचे उड़ान भरते हुए युगांडा के एटम्बी एयरपोर्ट के ट्रैफिक कंट्रोल से बच कर रन वे पर उतर जाते है. रात के अंधेरे में चारों विमानों को इस तरह उतारा गया की वहाँ पर मौजूद आतंकवादी और आर्मियो को इसकी भनक भी नहीं पड़ी.

इन विमान में 100 इसराइली आर्मी थे जो तीन ग्रुप में बट गए. एक ग्रुप वहाँ गया जहाँ पर इसराइली नागरिकों बंधक बना कर रखा गया था. दूसरा ग्रुप आतंकवादियो और युगांडा की आर्मी के साथ लड़ने के लिए तैयार था और तीसरा ग्रुप नागरिकों को सुरक्षित विमान में बैठने के लिए तैयार था.

इस ग्रुप ने बहुत ही अच्छी तरह से अपने मिशन को अंजाम दिया जिसमे 3 नागरिक की और इजराइल के यूनिट के कमांडर योनतन नेतन्याहू की भी जान चली गई. 53 मिनट चले इस मिशन में 7 आतंकवादी और युगांडा के 48 जवान को उनके ही घर में जाकर मार गिराया. भले ही मोसाद ने अपना एक जवान खो दिया पर इसके कारन  ईदी अमीन सहित पूरी दुनिया यह कारनामे से चोंक उठी थी.

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ऑपरेशन ओपेरा, 7 जून 1981 - Operation Babylon or Operation Opera
बात है सन 1960 की जब इराक अपने देश में एक परमाणु कार्यक्रम स्थापित करना चाहता था ताकि अपने देश में ही परमाणु हथियार बनाया जा सके और वक्त आने पर इजराइल को धमकाया जा सके. इसके लिए फ्रांस के साथ लंबी चर्चा के बाद नवम्बर 1975 में दोनों देशों के बीच करार हुआ है. जिसके तहत फ्रांस इराक को परमाणु भठ्ठी बनाने में मदद करेगा.

इजराइल के विदेश मंत्री मोशे दयान ने अमेरिका, फ़्रांस और इटली से विनती की की इराक में परमाणु भठ्ठी बनने पर रोक लगा दी जाए. लेकिन सभी देशों ने यह बात ठुकरा दी. वही इराक का राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने बयान दिया की यह सिर्फ शांति स्थापना के लिए ही है पर इजराइल को इराक पर भरोसा नहीं था.

अब इजराइल Operation Opera की तैयारी करने लगा था. इराक में जहाँ भठ्ठी बन रही थी वो जगह इजराइल के हवाई अड्डे से करीब 1600 किलोमीटर की दूरी पर थी. इसी लिए यदि इजराइल को वो भठ्ठी को उड़ाना है तो इसको आरब देश जॉर्डन और सऊदी के उपर से जाना होगा जहाँ पर इसको ईंधन भरने की कोई सुविधा मिलने वाली नहीं थी.  उस वक्त इराक और ईरान के बीच में युद्ध चल रहा था इसका फायदा उठाते हुए इजराइल के दो विमान इराक के दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्रों में सफ़र करके वापिस लौट आया और तय किया की सऊदी अरब के क्षेत्र से इराक में हमला करेंगे क्योंकि सऊदी अरब और इराक के बीच में अच्छा संबंध होने की वजह से उस सीमा पर सेना बहुत ही कम थी.

7 जून 1981 की दोपहर को इजराइल ने इराक में बन रही भठ्ठी को उड़ाने के लिए फाइटर प्लेन को रवाना कर दिया. हमला करने का मकसद सिर्फ भठ्ठी को ही उड़ाना था किसी नागरिक की जान लेना नहीं था, इसी वजह से Sunday के दिन हमला किया ताकि वहां पर कोई भी मजदुर मौजूद ना हो. सऊदी अरब और जॉर्डन को बेवकूफ़ बनाकर इसराइली फाइटर प्लेन इराक की सीमा में घुस गया और सिर्फ 5 सेकंड के अन्दर 84 बम गिरा कर पूरी भठ्ठी को तबाह करके सही सलामत वापिस लौट आए. 

दोस्तों, यह थी ताकत इजराइल और उसकी खतरनाक ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद की, वो भले ही चारों और दुश्मनों से घिरा हुआ है पर फिर भी सभी दुश्मन देशों को अकेला ही शिकस्त देता था. मोसाद के जासूस पूरी दुनिया में फैले हुए है और सभी पर नजर रखे हुए है, यदि कोई उसके देश के खिलाफ शाजिस कर रहा होता है तो यह उनके हमला करने से पहले ही उन पर टूट पड़ता है. इसी वजह से किसी भी देश में इजराइल की तरफ आँख ऊँची करने की ताकत नहीं है.

आपको मोसाद : दुनिया की सबसे खतरनाक ख़ुफ़िया एजेंसी | जाने इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी के 6 खतरनाक मिशन के बारे में आर्टिकल पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ इसको शेयर ज़रुर करना. आप चाहे तो video के रूप में भी यह सारी बातें देख सकते है.