स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय और उनके जीवन से जुड़े कुछ अनमोल तथ्य | Swami Vivekananda Biography in Hindi


Swami Vivekananda Biography in Hindi | स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय और उनके जीवन से जुड़े कुछ अनमोल तथ्य


प्राचीन भारत से लेकर वर्तमान समय तक यदि किसी शक्सियत ने भारतीय युवाओ को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है तो वो है स्वामी विवेकानंद. विवेकानंद एक ऐसे व्यक्तिमत्व है जो देश के हर युवा के लिये आदर्श बन सकते है. उनकी कही एक भी बात पर यदि कोई अमल कर ले तो शायद उसे कभी जीवन में असफलता व् हार का मुह न देखना पड़े. आइये आज के आर्टिकल द्वारा स्वामी विवेकानंदजी के जीवन के बारे में पूरी जानकारी के बारे में पढ़ते हे.

इस लेख के चर्चा के मुद्दें:-

प्रारंभिक जीवन, जन्म और बचपन
स्वामी विवेकानंद की शिक्षा
स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का मिलन
स्वामी विवेकानंद का भारत भ्रमण
स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कैसे हुई
समाज को कितना योगदान दिया
स्वामी विवेकानन्द द्वारा बोले गए 10 सबसे प्रेरणादायक कथनों
स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन
स्वामी विवेकानंद से संबंधित कुछ रोचक तथ्य


Swami Vivekananda Biography in Hindi | स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय और उनके जीवन से जुड़े कुछ अनमोल तथ्य

स्वामी विवेकान्द पर बहोत लोगो ने बहोत सारे लेख लिखे हुए हे लेकिन में आपको कुछ अलग तरीके से और एक ही पोस्ट में सारी जानकारी देने वाला हु. तो चलिए विस्तार से जानते हे स्वामीजी के बारे में.

प्रारंभिक जीवन, जन्म और बचपन
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को मकर सक्रांति के दिन भारत के कोलकाता शहर में हुआ था. स्वामी विवेकानंद का का बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था. उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था जो कोलकाता हाई कोर्ट में प्रसिद्ध वकील थे. और उनकी माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था जो धर्म कर्म में मानने वाली गृहिणी थी. उनकी माता नरेंद्र नाथ को रामायण और महाभारत के किस्से कहानियां सुनाया करती थी इस कारण बचपन से ही नरेंद्र की हिंदू धर्म ग्रंथों मैं बहुत रुचि थी.
नरेंद्र बचपन से ही बहुत शैतान थे,कई बार उनकी माँ के लिए उन्हें सम्भालना ही मुश्किल हो जाता था,ऐसे में उनकी माँ उन  पर  ठंडा पानी डालती थी और भगवान शिव का जाप करती थी,जिससे वो तुरंत शांत हो जाते थे.


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एक बार स्कूल में किसी बात पर अन्याय को देखकर उनकी माँ ने कहा था कि ये बहुत महत्वपूर्ण हैं कि तुम सही और सत्य की राह पर चलो, कई बार तुम्हे सत्य की राह पर चलते हुए कडवे अनुभव भी हो सकते हैं और लेकिन तुम्हे किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होना हैं. बहुत वर्षों बाद नरेन्द्रनाथ ने अपने भाषण में माना भी था की मैं अपनी माँ की शिक्षा का आभारी हूँ.

स्वामी विवेकानंद की शिक्षा
स्वामी विवेकानंद को बाल्यावस्था से ही जीवन और जीवन से जुड़े रहस्यों को जानने की तीव्र रूचि थी और इसके लिए उन्होंने सन् 1871 में आठ साल की आयु में ईश्वर चंद विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में प्रवेश प्राप्त किया और इसके बाद सन् 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया.  सन् 1879 में उनका परिवार वापस कलकत्ता आया और वहा प्रेसीडेंसी कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में प्रथम श्रेणी के अंक प्राप्त करने वाले वह एक मात्र छात्र बने. सन् 1881 में उन्होंने ललित कला और 1884 में कला स्तानक की डिग्री प्राप्त की. स्वामी जी की वेद, उपनिषद, रामायण, गीता और कई पुराणों में तथा हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी जो की उनकी माता की दें थी.

स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का मिलन
1881 में दक्षिणेश्वर के मंदिर  में उनका परिचय श्री रामकृष्ण  से हुआ था, जो कि एक बहुत बड़े संत और आध्यात्मिक व्यक्ति थे और वहीं से गुरु रामकृषण और शिष्य विवेकानंद में चुम्बकीय आकर्षण का अध्याय शुरु हुआ था. नरेंद्र को रामकृष्ण ने बहुत प्रभावित किया,और नरेन्द्र वहाँ रोज जाने लगे. समय के साथ नरेंद्र का आध्यात्म झुकाव रामकृष्ण के तरफ होने लगा और उन्होंने रामकृष्ण के भक्ति के तरीके को स्वीकार कर लिया, और साथ ही ब्रह्म समाज को भी छोड़ दिया.

सन 1884  में इनके पिता का देहांत हो गया और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. इससे घर-परिवार की जिम्मेदारी नरेंद्र पर आ गयी. फिर भी उन्होंने अपनी भक्ति को नहीं त्यागा और कम के साथ साथ हर रोज मंदिर जाते और रामकृष्ण के पास समय भी बिताते.
एक बार रामकृष्ण ने उन्हें कहा कि माँ उन्हें दर्शन देगी और तब वो माँ से वो मांगे जो वो चाहते हैं ताकि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर जाये पर वो जब भी माँ के सामने जाते तो उनसे मांगते माँ मुझे ज्ञान दो, भक्ति दो, वैराग्य दो इस तरह आखिरी प्रयास तक वो माँ काली से अपने लिए वैभव और अपने परिवार के लिए ऐशो आराम की जिन्दगी नहीं मांग सके.
अब उनका ध्यान संसार में बिलकुल नहीं लग रहा था और वो सन्यासी बनाना चाहते थे. एक दिन संसार त्यागने की कामना लिये नरेन्द्र अपने गुरु रामकृष्ण के पास गये लेकी उनके गुरु ने कहा की तुम अपना कार्य पूरा किये बिना इस संसार से विदा नही हो सकते हो. गुरु के संदेश ने नरेन्द्र के ह्रदय को आनंद और आशा की ज्योति से प्रकाशित कर दिया था. अब श्री रामकृष्ण उनकी दृष्टी में गुरु, पिता- सर्वस्व बन गये थे. उसी दिन से नरेन्द्र के जीवन में एक नवीन अध्याय का आरंभ हुआ.

स्वामी विवेकानंद का भारत भ्रमण
25 साल की उम्र में ही स्वामी विवेकानन्द ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए और इसके बाद वे पूरे भारत वर्ष की पैदल यात्रा के लिए निकल पड़े. अपनी पैदल यात्रा के दौरान अयोध्या, वाराणसी, आगरा, वृन्दावन, अलवर समेत कई जगहों पर पहुंचे. पैदल यात्रा के दौरान उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों और उनसे संबंधित लोगों की जानकारी मिली. स दौरान उन्हें जातिगत भेदभाव जैसी कुरोतियों का भी पता चला जिसे उन्होनें मिटाने की कोशिश भी की.


23 दिसम्बर 1892 को विवेकानंद कन्याकुमारी पहुंचे जहां वह 3 दिनों तक एक गंभीर समाधि में रहे और यहां से वापस लौटकर वे राजस्थान के आबू रोड में अपने गुरुभाई स्वामी ब्रह्मानंद और स्वामी तुर्यानंद से मिले. जिसमें उन्होनें अपनी भारत यात्रा के दौरान हुई वेदना प्रकट की और कहा कि उन्होनें इस यात्रा में देश की गरीबी और लोगों के दुखों को जाना है और वे ये सब देखकर बेहद  दुखी हैं. इसके बाद उन्होनें इन सब से मुक्ति के लिए अमेरिकाजाने का फैसला लिया. विवेकानंद जी के अमेरिका यात्रा के बाद उन्होनें दुनिया में भारत के प्रति सोच में बड़ा बदलाव किया था. और इसके दोरान उन्होंने अम्रेरिका के सिकागो में सन 1893 में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में हिस्सा लिए और भासन किया जीसको आज भी लोग याद कर रहे हे.

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कैसे हुई
स्वामी विवेकानन्द को अपनी मृत्यु का पता था. जॉन पी फॉक्स को एक पत्र लिखते वक्त स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि, "मुझे साहस और उत्साह पसन्द है. मेरे समाज को इसकी बहुत ज़रूरत है. मेरा स्वास्थ्य कमज़ोर हो रहा है और बहुत समय तक मुझे ज़िन्दा बचने की उम्मीद नहीं है.



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मात्र 39 साल की छोटी उम्र में उनका मृत्यु को पाना ना केवल हिंदुत्व के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए मानवता और योग के विकास की दिशा में एक बड़ा आघात था.

शिकागो सम्मेलन को संबोधित करने के बाद अमेरिका समेत पूरी दुनिया में उनके अनुयायी बन चुके थे और सभी इस छोटी आयु में उनकी मौत का कारण जानना चाहते थे

4 जुलाई, 1902 को अपनी मौत के दिन संध्या के समय बेलूर मठ में उन्होंने 3 घंटे तक योग किया. शाम के 7 बजे अपने कक्ष में जाते हुए उन्होंने किसी से भी उन्हें व्यवधान ना पहुंचाने की बात कही और रात के 9 बजकर 10 मिनट पर उनकी मृत्यु की खबर मठ में फैल गई.
मठकर्मियों के अनुसार उन्होंने महासमाधि ली थी, लेकिन मेडिकल साइंस इस दौरान दिमाग की नसें फटने के कारण उनकी मृत्यु होने की बात मानता है. हालांकि कई इसे सामान्य मृत्यु भी मानते हैं.

स्वामी विवेकानन्द अपनी 39 वर्षीय उम्र में इतने पीड़ित थे, जिसका कोई हिसाब नहीं था. स्वामी विवेकानन्द को उस वक्त गले में दर्द, किडनी में समस्या, दिल में समस्या, दाँईं आँख लाल होना, डायबिटीज़, माइग्रेन, टॉन्सिलटिस, अस्थमा, मलेरिया, बुखार, लिवर में समस्या, अपच, गैस्ट्रोएन्टेरिटिस, ब्लोटिंग, डायरिया, डिस्पेप्सिया, गॉल्सटोन जैसी 30 बड़ी गम्भीर बीमारियां हुईं. इसके बाद भी इस वक्त में स्वामी विवेकानन्द दैनिक काम किया करते थे.

समाज को कितना योगदान दिया
३९ वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जो काम कर गए,  वे आनेवाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे. स्वामी विवेकानन्द उच्च विचारों के व्यक्तित्व थे, जिन्होंने विश्व को भारतीय चिंतन, दर्शन, आध्यात्मवाद और विश्वबंधुत्व का सन्देश दिया. 30 साल की उम्र में स्‍वामी विवेकानन्‍द अमेरिका के शिकागो शहर पहुंचे और वहां विश्व धर्म संसद में भारत के प्रतिनिधित्व बने और संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कूच की. सन् 1894 में उन्‍होनें न्‍यूयॉर्क में वेदान्‍त सोसायटी की नींव रखी और 1895 में इंग्लैंड देश का भ्रमण किया. सन् 1881 से 1884 तक स्‍वामी सेन की आशा की किरण से जुड़े थे. जिसमें उन्‍होंने युवाओं को धूम्रपान और मदिरापान छोड़ने के लिए प्रेरित किया था.इसके आलावा स्वामी विवेकान्द का हमारे इस समाज पर बहोत सारा योगदान हे जिसे हम एक ही लेख में लिख नहीं सकते हे.

स्वामी विवेकानन्द द्वारा बोले गए 10 सबसे प्रेरणादायक कथनों
1. “उठो,जागों और तब तक मत रुको जब तक कि तुम्हारे लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये”.
2. “दिन में एक बार स्वयं से बात जरूर करो अन्यथा आप संसार के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति से मिलने से चूक जायेंगे".
3. “हमारे देश को नायकों की जरुरत हैं, नायक बनो, तुम अपना कर्तव्य करते जाओ, तुम्हारे अनुसरण कर्ता खुद बढ़ जायेंगे".
4. “कुछ सच्चे, ईमानदार और ऊर्जावान पुरुष और महिलाएं एक वर्ष में एक सदी की भीड़ से भी अधिक कार्य कर सकते हैं”.
5. “मृत्यु तो निश्चित हैं, एक अच्छे काम के लिये मरना सबसे बेहतर हैं”.
6. "पहली बार में बड़ी योजनाओं को मत बनाओ, लेकिन, धीरे-धीरे शुरू करो, अपने पैर जमीन पर रखकर आगे और आगे की तरफ बढ़ते रहो".
7. “धन पाने के लिये कड़ा संघर्ष करो पर उससे लगाव मत करो.
8. छल और पाखंड के माध्यम से किसी भी बड़े लक्ष्य को प्राप्त नही क्या जा सकता है बल्कि इसे प्यार, जूनून और असीमित ऊर्जा के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है .
9. “आप भगवान में तब तक विश्वास नहीं कर सकते जब तक कि आप खुद में विश्वास नहीं करते”.
10. "जो आप पर भरोसा करते हैं उनके साथ कभी भी धोखा न करें".

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन
ü  मैं सिर्फ और सिर्फ प्रेम की शिक्षा देता हूं और मेरी सारी शिक्षा के उन महान सत्य पर आधारित है जो हमें समानता और आत्मविश्वास की सभ्यता का ज्ञान देती है .
ü  आप को 33 करोड़ देवी-देवताओं पर भरोसा है लेकिन खुद पर नहीं  तो आपको मुक्ति नहीं मिल सकती खुद पर भरोसा रखो अडिग रहें और मजबूत बने हमें इसकी  जरूरत है.
ü   सफलता के तीन आवश्यक अंग है शुद्धता, धैर्य और दृढ़ता लेकिन इन सब से बढ़कर जो आवश्यक है वह है प्रेम.
ü  उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत,  उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत.
ü   जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते.
ü   सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है फिर भी हर  एक   सत्य होगा.
ü   खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है .
ü   मनुष्य की सेवा करो भगवान की सेवा करो.
ü   कुछ मत पूछो बदले में कुछ मत मांगो जो देना है वह दो वह तुम तक वापस आएगा पर उसके बारे में अभी मत सोचो.
ü  शारीरिक बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से जो कोई भी कमजोर बनता है उसे जहर की तरह त्याग दो.
ü  एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ.
ü   सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चे होना स्वयं पर विश्वास करो.
ü   किसी चीज से डरो मत, तुम अद्भुत काम करोगे यह निर्भयता ही है जो क्षण भर में परम आनंद लाती है.

ü   स्वतंत्र होने का साहस करो, जहां तक तुम्हारे विचार आते हैं वहां तक आने का प्रयास करो, उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करो.

स्वामी विवेकानंद से संबंधित कुछ रोचक तथ्य
·        ü  स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्ता था लेकिन उनकी माता ने उनका नाम वीरेश्वर रखा था.
ü  उस समय भारत पर ब्रिटिशो का राज था और कलकत्ता उस समय भारत की राजधानी थी.
ü  विवेकानंद एक साधारण बालक थे लेकिन उन्हें पढने में काफी रूचि थी। उन्हें वेद, उपनिषद, भगवत गीता, रामायण, महाभारत और पुराण में काफी रूचि थी.
ü  नरेन्द्रनाथ  इश्वर चन्द्र विद्यासागर इंस्टिट्यूट में पढ़ते थे और बाद में उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से एंट्रेंस की परीक्षा पास की. सन 1884 में उन्होंने अपनी बैचलर की डिग्री पूरी की.
ü  सन 1881 में नरेन्द्र की मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई और धीरे धीरे वो उनके जीवन से प्रभावित होने लगे.
ü  16 अगस्त 1886 को रामकृष्ण की मृत्यु हो गयी. रामकृष्ण ने विवेकानंद को सिखाया था की इंसानों की सेवा करना भगवान् की पूजा करने से भी बढ़कर है.
ü  नरेन्द्रनाथ से विवेकानंद का नाम उन्हें खेत्री के महाराजा अजित सिंह ने दिया था.
ü  1888 में विवेकानंद ने भारत भ्रमण शुरू किया. 5 सालो तक वे पुरे भारत में घूमते रहे और भारत में अलग-अलग तरह के लोगो के साथ रहे.
ü  जुलाई 1893 में विवेकनन्द शिकागो गये. उस समय वहा विश्व सर्व धर्म सम्मलेन का आयोजन किया गया था लेकिन किसी वजह से उन्हें पहले बोलने का अवसर नही दिया गया. पर बाद में कुछ समय बाद प्रोफेसर जॉन हेनरी की सहायता से उन्हें बोलने का मौका मिल ही गया.
ü  11 सितम्बर 1893 को विश्व धर्म सम्मलेन में उन्होंने हिंदुत्वता पर अपना पहला भाषण दिया. उन्होंने अपने भाषण की शुरुवात सिस्टर एंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिकासे की. ये सुनते ही वहा उपस्थित सभी 7 हज़ार लोगो ने उनके लिये खड़े होकर जोरो से तालिया बजायी.
ü  1897 में वे भारत वापिस आये. भारत में भी उन्होंने काफी भाषण दिए. वे सामाजिक मुद्दों पर भी भाषण दिया करते थे. उस समय उनके भाषणों का महात्मा गांधी, सुभास चन्द्र बोस जैसे नेताओ पर काफी प्रभाव पड़ा था.
ü  सन 1899 में ख़राब हालत होते हुए भी उन्होंने दक्षिण की यात्रा की. अपनी इस यात्रा में उन्होंने सेन फ्रांसिस्को और न्यू यॉर्क में वेदांत सोसाइटी की स्थापना की और कैलिफ़ोर्निया में शांति आश्रम की स्थापना की.
ü  4 जुलाई 1902 को 39 साल की आयु में बेलूर मठ में ही स्वामी विवेकानंद की मृत्यु हो गयी. उनके जन्मदिन को भारत में राष्ट्रिय युवा दिन के रूप में मनाया जाता है.

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