Amazing life story of  Chhatrapati Shivaji Maharaj in Hindi - मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की जीविनी

हमारे भारत में कई सारे वीर सपूत पैदा हुए है जिन्होंने समय-समय पर अपनी मातृभूमि के लिए खुद की समर्पित कर दिया था. इसी वजह से भारत देश को वीरो की भूमि कहा जाता है.

एक समय था जब भारत देश में सभी जगह सुख और समृद्धि थी और उस वक्त भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था लेकिन इस सोने की चिड़िया पर कई सारे विदेशीओ की बुरी नजर पड़ी जिनमे मुग़ल, अंग्रेज, पुर्तगालियो जैसे विदेशी सामिल थे. उन विदेशी दुश्मनो के रूप में सबसे पहेले अकबर ने भारत को पूरी तरह से गुलाम बनाना चाहा लेकिन उस समय भारत के वीर सपूत महाराणा प्रताप ने अकबर के इस सपने को चकनाचूर कर दिया. एसा ही सपना लेकर औरंगजेब भी भारत पर आया था लेकिन उस वक्त उनके बिच में छत्रपति शिवाजी महाराज आकर खड़े हो गए और भारत देश को मुगलों की बुरी नजर से बचाया.

आज के इस आर्टिकल में हम छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में बात करने वाले है जिसके बारे में जानकार हम सभी लोग Motivate हो कर आगे बढ़ सकते है. उम्मीद है आपको यह आर्टिकल जरुर पसंद आएगा.

1. छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म और आरम्भिक जीवन
2. स्वराज यात्रा का संकल्प
3. छत्रपति शिवाजी महाराज की युद्ध निति
4. छत्रपति शिवाजी महाराज का किलों पर अधिकार
5. शाहजी को कारावास और छत्रपति शिवाजी महाराज की सुजबुज
6. भारत की पहेली समुद्री सेना का निर्माण
7. विशालकाय अफजलखान का चतुराई से वध और प्रतापगढ़ जित
8. सूरत की लूंट
9. मिर्जाराजा जयसिंह से शांति समजोता और प्रमुख शर्तें
10. दिल्ली के दरबार में छत्रपति शिवाजी का आगमन
11. सिंहगढ़ की लड़ाई और तानाजी का बलिदान
12.. राज्य विस्तार
13. स्वर्गवास
14. छत्रपति शिवाजी महाराज के रोचक तथ्य

चलिए अब जानते है सभी मुद्दों के बारे में विस्तार से.

छत्रपति शिवाजी का जीवन परिचय और रोमांचक तथ्य - Motivational Story about Chhatrapati Shivaji in Hindi

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म और आरम्भिक जीवन
शिवाजी का पूरा नाम शिवाजी राजे भोंसले था. छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी, 1630 में शिवनेरी दुर्ग (जो पुणे के उत्तर में स्थित है) में हुआ था. उनकी माता का नाम जिजाबाई और पिता का नाम शाहजी भोंसले था.

शिवाजी के जन्म के समय शाहजी लड़ाई में उल्जे हुए थे इसी वजह से शिवाजी का लालन-पालन उनकी माता जिजाबाई ने ही किया था. जिजाबाई बचपन से ही शिवाजी को महाभारत, रामायण और श्रीमद भगवदगीता के बारे में बताया करती थी जिनके कारन बचपन से ही शिवाजी के अन्दर भारतीय संस्कृति के प्रति बेहद ही लगाव हो गया था और बचपन से ही एक Natural Leadership उनके अंदर तैयार हुई.

शिवाजी जब छोटे थे तभी से उनके पिता बीजापुर के सुल्तान की सेवा करते थे लेकिन शिवाजी को मुगलों की गुलामी बिलकुल भी पसंद नहीं थी और उन्होंने बचपन से ही स्वराज्य का सपना देख लिया था. इसी वजह से जब शिवाजी की उम्र के बच्चे खेल रहे थे तब शिवाजी भारत में स्वराज्य कैसे लाई जाए इसके बारे में ही सोच रहे थे.

स्वराज यात्रा का संकल्प
पुणे के नजदीक मावल नामकी एक जगह पर छोटेसे गाँव हुआ करता था. वहां पर शिवाजी गए और वहां के गरीब लोगो को शिवाजी मिले. उन गाँव के लोगो में बहोत ही ताकात और साहस था लेकिन उनको गाइड करने वाला कोई नहीं था. शिवाजी उन लोगो से मिले और समजाया की मुग़ल लोग मराठाओ को उनके नोकर समजते है और यह नोकर जो है, गुलामी जो है वो सिर्फ एक मानसिकता है और कुछ नहीं. हम सभी को साथ मिलकर इन मुग़ल साम्राज्य की चुंगल से मराठाओ को छुड़ाना है.


इसके बाद शिवाजीने इसी गाँव के शिव मंदिर के पास जाकर खंजर निकाला और अपना रक्त बहाकर शिवलिंग पर रक्त अभिषेक करके प्रण लिया की वो स्वराज्य की स्थापना करेंगे.

छत्रपति शिवाजी महाराज की युद्ध निति
अब जब शिवाजी ने स्वराज्य की यात्रा करने का संकल्प ले लिया था पर उनके पास बहोत ही कम योद्धा थे. शिवाजी के पास Manpower नहीं था, Resources नहीं थे, funds भी नहीं था, किसी का support भी नहीं था इसके बावजूद भी वो आगे बढे क्यूंकि उनका दिमाग बहोत ही तेज था.

छत्रपति शिवाजी के अन्दर महाराणा प्रताप की ताकत और कौटिल्य चाणक्य की बुद्धि प्रतिमा थी जिसके कारन वो किसी भी शत्रु पर बहोत ही आसानी से विजय प्राप्त कर लेते थे. छत्रपति शिवाजी Guerilla Warfare युद्ध निति से लड़ते थे जिसको छापामार युद्ध कहा जाता है.

शिवाजी को पहाड़ी चूहा कहा जाता था, यह पहाडियो के भीतर से अपने दुश्मन पर हमला करते थे जिसके कारन किसी भी दुश्मन को पता भी नहीं चलता था की शिवाजी कहासे आकर उनपर टूट पड़ेगे. उनकी यही युद्ध निति की बदोलत छोटीसी सेना से छत्रपति शिवाजी ने दक्षिण भारत से लेकर गुजरात तक कई सारी जगह पर अपना साम्राज्य फैला दिया.

छत्रपति शिवाजी महाराज का किलों पर अधिकार
छत्रपति शिवाजी ने स्वराज्य की मजबूती के लिए दुर्ग यानि की कीलें पर अपना अधिकार स्थापित करने के योजना बनाई. उस समय बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह और मुगलों के बिच संघर्ष चल रहा था एसे में शिवाजी ने सबसे पहेले बीजापुर साम्राज्य के अंतर्गत किलों को अपना निशाना बनाना शुरू किया.

इसी निति के चलते शिवाजी ने सबसे पहेले तोरण कीलें को अपने वश में करना चाहा जो पुने के दक्षिण-पश्चिम में 30 किलोमीटर की दुरी पर था. शिवाजी ने बड़ी ही चतुराई से आदिलशाह के सभी अधिकारिओ को खरीदकर बिना कोई शस्त्र उठाए इस दुर्ग पर अपना अधिकार प्राप्त कर लिया और इसके तुरंत ही वहा से 10 किलोमीटर की दुरी पर मोजूद राजगढ़ कीलें पर भी अपना अधिकार प्राप्त कर लिया.


राजगढ़ दुर्ग के बाद शिवाजी ने चाकन के दुर्ग और कोंडाना के दुर्ग पर भी अपना अधिकार हांसिल कर लिया और बाद में कोंडाला कीलें का नाम सिंहगढ़ रख दिया. इसके बाद शिवाजी ने रातो रात सूपा के दुर्ग पर आक्रमण करके उनको जित लिया.

इसी समय पुरन्दर के किलेदार की मृत्यु हो गई और किले पर अपना अधिकार जताते किलेदार के तीनो बेटे आपस में लड़ने लगे. शिवाजी ने इसका फायदा उठाया और कूटनीति से तीनो भाईओ को बंदी बनाकर पुरन्दर के किले पर भी अपना अधिकार जमा लिया. इस तरह छत्रपति शिवाजी महाराज ने बिना कोई खूनखराबे कई सारे किले जित लिए थे.
अब तक शिवाजी ने बिना खूनखराबे के अपनी युद्धनिति और बुद्धि प्रतिमा के कारन आधे से भी ज्यादा भारत के किले पर कब्ज़ा कर चुके थे. इसके बाद शिवाजी ने आबाजी सोन्देर को 1 अक्षौहिणी सेना के साथ कोंकण किले को जितने के लिए भेज दिया. आबाजी सोन्देर ने कोंकण कीलें के साथ 9 और किले जित लिए.

शाहजी को कारावास और छत्रपति शिवाजी महाराज की सुजबुज
शिवाजी एक के बाद एक किले पर अपना अधिकार जमाते गए जिसके कारन बिरजापुर के सुल्तान को बहोत ही गुस्सा आ गया. वो शिवाजी को रोक नहीं सकते थे इसके लिए उन्होंने शिवाजी के पिता शाहजी को बंदी बनाकर कारावास में डाल दिया. अब शिवाजी ने एक बार फिर से अपना तेज दिमाग लगाया. शिवाजी को पता था की मुगल बादशाह शाहजहाँ और बिरजापुर के सुल्तान आदिलशाह के बिच में संघर्ष चल रहा था.

शिवाजी शाहजहाँ के पास पहुंचे और कहाँ की, "आप आदिलशाह को Influence करो की वो मेरे पिता को छोड़े. शिवाजी ने शाहजहाँ को कहा की तुम्हारे कई सारे युद्ध होने वाले है North में और उन सभी युद्ध में यदि तुम्हे जरुरत पड़ी तो पीछेसे आकर में मदद करूँगा. इसी लिए आप आदिलशाह को कहो की मेरे पिता को तुरंत ही रिहा कर दिया जाए". शिवाजी की बात मानकर शाहजहाँ ने तुरंत ही शिवाजी के पिता को कारावास से मुक्त करवा दिया. इस तरह एक बार फिर से शिवाजी ने अपनी सुजबुज से बिना कोई हथियार उठाए अपना काम पूर्ण कर लिया.

भारत की पहेली समुद्री सेना का निर्माण
अपने पिता को कारावास से मुक्त कराने के बाद शिवाजी फिर से अपने स्वराज्य के काम के लिए आगे बढ़ने लगे. शिवाजी ने कोंकण कोस्ट लाइन के पास से जो आजका गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और निचे कर्नाटका तक की एक पूरी कोस्ट लाइन पर एक Navy Soldier यानि की समुद्री सेना तैयार की. यह भारत की सबसे पहेली नौ सेना थी जिसके कारन शिवाजी को Father of Indian Navy भी कहा जाता है. शिवाजी की इस योजना में हमको Preparation of Scenario Analysis दिखने को मिलता है.

विशालकाय अफजलखान का चतुराई से वध और प्रतापगढ़ जित
शिवाजी की हरकतों से आदिलशाह बहोत ही तंग आ चूका था इसी वजह से आदिलशाह ने अपने सबसे ताकतवर सेनापति अफजलखान को एक विशाल सेना के साथ शिवाजी को मारने के लिए भेजा. अफजलखान शिवाजी से लगभग दो गुना लम्बा-चौड़ा था. शिवाजी जानते थे की अफजलखान को सीधे युद्ध में हराना नामुमकिन है क्यूंकि उनके पास एक विशाल सेना थी.

अफजलखान को पता था की शिवाजी एक इमानदार इन्सान है इसी वजह से उन्होंने शिवाजी को अकेले मिलने के लिए बुलाया. अफजलखान ने दूत भेज कर शिवाजी को कहा की "हम दोनों अकेले ही मिलेगे, ना मेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र होगा ना तुम्हारे पास, ना तुम्हारे पास कोई सेना होगी ना मेरे पास कोई सेना होगी". शिवाजी मिलने के लिए राजी हो गए लेकिन वो जानते थे की अफजलखान एक सैतान है और किसी भी नियम को मानता नहीं था.

जैसे ही शिवाजी अफजलखान से मिलने के लिए गए तब अफजलखान ने शिवाजी को गले से मिला कर शिवाजी की पीठ पर खंजर से वार कर दिया लेकिन शिवाजी पहेले से ही Prepared होकर ही आए थे. शिवाजी ने तुरंत ही अपने बाए हाथ में छुपाए सिंगनख नामक चाकू को निकाला और अफजलखान के पेट को एक ही वार में चिर डाला. इसके बाद तुरंत ही अफजलखान की सेना पर आक्रमण करके प्रतापगढ किले को जित लिया.

सूरत की लूंट
अब शिवाजी ने मुगलों के सबसे अमीर शहर में सामिल सूरत को लुंटने के योजना बनाई. शिवाजी 4 हजार सैनिको के साथ सूरत को लूंटने के लिए रवाना हो गए. 6 जनवरी 1664 की सुबह 11 बजे शिवाजी सूरत पहोंचे. सूरत में डेरा डाल कर सबसे पहेले शिवाजी ने वहां के गवर्नर इनायत खान और तिन बड़े अमीर विरजी वोरा, हाजी जाहिद बेग और हाजी कासिम को संदेशा भेजा की वो बिना किसी हिंसा के हमको धन दे दे.


अगले दिन शिवाजी के पास इनायत खान ने अपना एक दूत भेजा जिसने शिवाजी पर हमला करना चाहा जिसके कारन उस दूत को मराठाओ ने मार दिया और बाद में सूरत पर हमला करके बड़े-बड़े अमीर लोगो को लूंट लिया. यह लूंट 6 जनवरी से लेकर 10 जनवरी तक हुई जिसमे शिवाजी के हाथ 1 करोड़ रुपए की संपति लगी. शिवाजी ने लूंट के वक्त ही शहर में कह दिया था की वो किसी को नुकसान पहुचाने नहीं आए है बल्कि औरंगजैब से बदला लेने के लिए आए है.

मिर्जाराजा जयसिंह से शांति समजोता और प्रमुख शर्तें
सूरत की लूंट के कारन औरंगजैब पूरी तरह से बोखला गया था और इसके कारन उनका सबसे शक्तिशाली राजपूत मिरजा राजा जयसिंह को शिवाजी को काबू में करने के लिए भेजा. जयसिंह के पास बहोत ही बड़ी विशाल सेना थी जिसने शिवाजी के पुरंदर किले को चारो और से घेर लिया. शिवाजी ने सोचा की यदि वे जयसिंह से युद्ध करगे तो मराठा साम्राज्य को काफी नुकसान होगा जिसके कारन शिवाजी मजबूर होकर जयसिंह के साथ संधि करने के लिए तैयार हो गए.

जयसिंह ने पुरंदर की संधि के लिए कुछ शर्ते रखी थी जो निम्नलिखित है:
1. शिवाजी को जीते हुए 23 किले देने होगे.
2. जरुरत के समय शिवाजी को किसी भी हाल में मुगलों की सहायता करनी पड़ेगी.
3. शिवाजी के पुत्र संभाजी को मुगलों के अधीन रहेकर मुग़ल सेना की कमान सम्भाल नि होगी.
4. यदि शिवाजी को बीजापुर क्षेत्र के कोंकण किले को रखना है तो मुगलों को 40 लाख रुपए का भुगतान करना होगा.
5. शिवाजी को पुरन्दर, रुद्र्मल, कोंडाना जैसे कई बड़े किले को छोड़ना होगा.

यह संधि शिवाजी के जीवन की सबसे बड़ी हार थी क्यूंकि शिवाजी के इतने सालो की महेनत पर एक ही जटके में पानी फिर गया था.

दिल्ली के दरबार में छत्रपति शिवाजी का आगमन
संधि पर अपने हस्ताक्षर और राजनितिक वार्तालाप के लिए औरंगजैब ने शिवाजी को दिल्ली बुलाया. शिवाजी जब दिल्ली के दरबार में पहुंचे तो उनको लगा की उनका ठीक तरीके से स्वागत नहीं किया गया है जिसके कारन शिवाजी क्रोधित हो उठे और भरी सभा के अंदर ही उनके उच्च अधिकारिओ को सम्बोधकर कहा की "यदि उनमे मुजसे अधिक योग्यता और साहस है तो मेरे साथ रण में आए और अपनी शक्ति का परिचय दे और मेरी वीरता देखे."

शिवाजी की इन बातो से सारे दरबारी लोग चकित हो गए की यह मराठा क्या अनर्थ कर रहा है, पुरे भारत के सम्राट सामने बैठे है और लाखो मुसलमान और सैनिको के बिच में अकेले खड़े होकर सुल्तान के सामने खुल्ली चुनोती दे रहा है. औरंगजैब उस वक्त तो कुछ नहीं बोला लेकिन वो अंदर से काफी डर गया था.

दुसरे दिन औरंगजैब ने शिवाजी और उनके बेटे संभाजी के निवास स्थान पर 5000 सैनिको का कडा पहेरा लगा दिया और दोनों को नजरकैद कर दिया. औरंगजैब ने शिवाजी को धोखे से मारने की योजना बनाई थी लेकिन इस योजना के बारे में कुंवर रामसिंह (जो राजा यशवंतसिंह का पुत्र था) को पता चल गया और उसने तुरंत ही इसकी खबर शिवाजी को दे दी.

खबर मिलते ही शिवाजी ने औरंगजैब से चंगुल से निकलने का फैसला कर लिया लेकिन हर वक्त उनके आस पास हजारो की संख्या में मुग़ल पहेरेदार हुआ करते थे. इसी वजह से शिवाजी ने बीमार होने का नाटक किया और कुछ दिनों तक अपना इलाज करने का नाटक जारी रखा. थोड़े दिन बाद शिवाजी और उनके बेटे संभाजी दोनों ही मुग़ल सल्तन से निकलने में कामयाब रहे.

सिंहगढ़ की लड़ाई और तानाजी का बलिदान
औरंगजैब की चंगुल से बहार आते ही शिवाजी ने अपना राज्यविस्तार करने का फैंसला कर लिया था वही दूसरी तरफ औरंगजैब ने हिन्दू राजा उदयभान को शिवाजी को बंदी बनाकर लाने के लिए भेजा था. उदयभान कोंडाना किले पर अपने विशाल सेना के साथ बिराजमान था. कोंडाना किले की बनावट इस तरह से थी की इस पर सीधा हमला करना नामुमकिन था.

शिवाजी के इस संकट के समय उनके बचपन के मित्र वीर तानाजी मालुसरे आगे आए और शिवाजी को कहा की वो कोंडाना किले को जित कर ही वापस लौंटेगे. उस वक्त तानाजी के बेटे की शादी थी लेकिन फिर भी तानाजी स्वराज्य की प्राप्ति के लिए आगे बढे.

4 फरवरी 1670 के दिन तानाजी 342 सैनिको के साथ कोंडाना गढ के पीछे की पहाड़ी पर चढने के लिए निकल पड़े. तानाजी से अपनी सेना के साथ कोंडाना किले के कल्याण दरवाजे तक पहोच गए और कल्याण दरवाजा खोल दिया. कल्याण दरवाजा खोलते तानाजी अपने 342 मराठा सैनिको को लेकर मोगलो के 5000 सैनिको के साथ सीधे युद्ध में उतर गए.

इस भीषण युद्ध में तानाजी और मराठाओ ने वीरता का परिचय दिया. मराठाओ ने भीषण युद्ध के बाद किले पर विजय प्राप्त कर लिया लेकिन इस युद्ध में तानाजी बुरी तरह से घायल होकर शहीद हो जाते है. जब शिवाजी को इस बात की खबर लगती है तो उनकी आँखों से अश्रु गिर पड़ते है और कहेते है की "गढ़ आला पर सिंह गेला".

स्वराज्य के राज्य विस्तार के लिए यह गढ़ जितना बेहद ही आवस्यकत था और तानाजी की बदोलत कोंडला गढ़ शिवाजी के कब्जे आ गया और यही से राज्य विस्तार का आरम्भ हुआ.

राज्य विस्तार
कोंडाला किला जितने के बाद शिवाजी ने राज्य विस्तार के लिए योजना बनानी शुरू करदी थी. पुरंदर की संधि में शिवाजी ने 23 कीलें गवाए थे पर उन्होंने हार नहीं मानी और बुरी तरह से मोगलो पर टूट पड़े. अगले कुछ ही सालो में शिवाजी ने 360 कीलें पर विजय प्राप्त कर लिया.

शिवाजी की लड़ाई की धर्म के विरुद्ध नहीं थी. इनकी लड़ाई थी मराठाओ की रक्षा करने के लिए, यह मुसलमानों के against नहीं थे पर मुगलों के against थे. यह वो मुग़ल थे जो विदेश से आए थे क्यूंकि मुसलमान तो शिवाजी की टीम में कई सारे थे. शिवाजी के कई बड़े-बड़े जनरल और दोस्त भी मुसलमान थे. शिवाजी सिर्फ और सिर्फ मुगलों के खिलाफ ही थे जिन्होंने बहार से आकार भारत के लोगो को गुलाम बना रखा था.

शिवाजी की एक और खास बात थी जो उन्हें मुगलों से अलग करती थी वो थी स्त्रिओ के प्रति सम्मान और आदर. शिवाजी ने इतने सारे किले जीते लेकिन कभी भी किसी मुगलों की स्त्रिओ पर बुरी नजर नहीं डाली थी और ना ही किसी सैनिक को एसा करने दिया था जबकि दूसरी और मुगलों ने कई सारी स्त्रियों का बलात्कार किया था. शिवाजी हर धर्म के लोगो का सन्मान करते थे और उनकी यही बातो के कारन भारतभर में शिवाजी का सन्मान किया जाता था.

स्वर्गवास
सन 1680 का प्रारंभ हो चूका था. शिवाजी ने बीजापुर सहित भारत के कई सारे राज्यों में स्वराज्य की स्थपना करदी थी. तभी मार्च 1680 के दिनमे उन्हें घुटन में बहोत ही सुजन पैदा हो गई थी, उनकी तबियत हर दिन बिगड़ रही थी और पूरा शरीर बीमारी में आ चूका था. लगादर 7 दिनों तक वो बीमारी से जुन्जते रहे और सातवे दिन 15 अप्रैल 1680 के दिन भारत के वीर सपूत छत्रपति शिवाजी की आत्मा अपना नश्वर देह छोड़ कर परम पद को प्राप्त हो जाती है. मृत्यु के समय उनकी आयु 50 साल की थी.

छत्रपति शिवाजी के बारे में रोचक तथ्य
1. छत्रपति शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में पुणे के जुन्नर नगर में हुआ था.

2. छत्रपति शिवाजी के पिता बीजापुर के दरबार के एक उच्च अधिकारी थे.

3. छत्रपति शिवाजी ने सन 1674 में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नीव रखी थी.

4. छत्रपति शिवाजी युद्ध की रणनीति बनाने में बहोत ही माहिर थे और सिर्फ 15 साल की उम्र में छापामार युद्ध से बीजापुर राज्य के तोरना किले पर कब्ज़ा किया था.

5. सन 1655 तक छत्रपति शिवाजी ने संपूर्ण कोंकण और पश्चिम घाट पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था.

6. शिवाजी को पहाड़ी चूहा कहा जाता था क्यूंकि वे गुरिल्ला रणनीति से छोटे समूह के साथ दुश्मन पर धाबा बोल देते थे. हमला करते वक्त उन्होंने कभी भी किसी धार्मिक स्थान और वहाँ पर रहेने वाले लोगो को नुकसान नहीं पहुचाया था.

7. छत्रपति शिवाजी महाराज हमेशा महिलाओ को सन्मान करते थे फिर चाहे वो मुगलों की महिलाए ही क्यूँ ना हो. यदि उनकी सेना से कोई भी कसी भी स्त्री का अपमान करता था तो शिवाजी उसको कड़ी सजा देते थे.

8. शिवाजी युद्ध के वक्त अपने सैनिको की जान का भी खयाल रखते थे इसके लिए वो कभी-कभी युद्ध से मैदान भी छोड़ देते थे ताकि सैनको की जान बचाई जा सके.

9. शिवाजी ने कभी भी देश के मुसलमानों को अपना दुश्मन नहीं समजा था उनकी लड़ाई सिर्फ बहार से आए मुगलों के खिलाफ ही थी. इसी वजह से शिवाजी के कई सारे दोस्त और उच्च अधिकारी मुसलमान थे.

10. शिवाजी ने अपने अंत समय तक आधे से भी ज्यादा भारत पर स्वराज्य की स्थापना कर दी थी जिसमे बीजापुर भी सामिल था.

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