विलुप्त पक्षी (Extinct Birds) वे पक्षी प्रजातियाँ हैं जो पृथ्वी से पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं और जिनका कोई जीवित सदस्य अब मौजूद नहीं है। आवास विनाश, अत्यधिक शिकार, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन तथा मानव गतिविधियाँ पक्षियों के विलुप्त होने के प्रमुख कारण माने जाते हैं।
Extinct Birds Facts in Hindi: हमारी दुनिया में कई हजारो सालो से अलग-अलग पक्षिओ की प्रजातिया मोजूद थी जो अब विलुप्त हो चुकी हे. इसमें से साल 1900 से लेकर अब तक के समय में इन जीवो की लगभग 200 प्रजातियाँ इस धरती से पुरी तरह समाप्त हो चुकी है. इनमे से कुछ तो ऐसे जीव है जिनकी संख्या लाखो में थी, लेकिन इंसानों की गतिविधियों, जंगल का विनाश, हमले और शिकार की वजह से ये अपना अस्तित्व बचा नही पाए.
कई सारे पक्षीओ की प्रजाति तो Prehistoric काल में ही समाप्त हो चुकी हे इसके अलावा भी आज विश्व में करीब 10000 प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं, इनमें से कुल 1200 प्रजातियां ऐसी है जो कि लुप्त होने की कगार पर है, इन पक्षियों की प्रजातियों को संकटग्रस्त घोषित किया गया है. IUCN (International Union for Conservation of Nature) की रेड लिस्ट के अनुसार अब तक पक्षियों की 187 से अधिक प्रजातियाँ पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त क्यों हो जाती है?
चलिए पहेले जानते हे की पक्षिओ की प्रजाति विलुप्त कैसे हो जाती है? इसके पीछे क्या वजह है? पक्षिओ के विलुप्त होने का कारन बहोत सारे हे, लेकिन इसका मूल कारन तो हम मनुष्य ही हे जो इन्सानों की तरह जीने के बजाय जानवर की तरह जीते है. मनुष्य द्वारा फेलाया गया प्रदुसण और जंगलो का विनाश इसमें मुख्य कारन हे. इसके अलावा शिकार भी एक कारन है.
पक्षिओ की प्रजाति मानवीय गतिविधियों जैसे अत्यधिक शिकार, जंगलों की कटाई, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और कीटनाशकों के उपयोग के कारण विलुप्त होती हैं। IUCN के अनुसार, वर्तमान में दुनिया की 1,200 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ खतरे में हैं। इंसानों की लापरवाही इनके विनाश का सबसे बड़ा कारण है।
पक्षिओ की कुछ प्रजाति का नष्ट होने का कारन हवामान और मोसम में हुए बदलाव भी है. कभी कभी मोसम के इस बदलाव से पुरे की पूरी पक्षियो की प्रजाति ही नष्ट हो जाती है. इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में भोजन न मिलने की वजह से भी इसके प्रजाति विलुप्त हो जाती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी अभी अपने छठे महाविनाश (Sixth Mass Extinction) के दौर से गुजर रही है, जिसमें पक्षी सबसे तेज़ी से प्रभावित हो रहे हैं।
जैसे की, आज के दौर पे हम मुनष्य अनाज को उगाने के लिए दवाएं का इस्तेमाल करते है, यह अनाज पक्षियों के लिए जानलेवा साबित होता है, जिसके चलते वो अंडे भी नहीं बना पाते और नए बच्चे को जन्म नहीं मिलता. इस तरह से पूरी की पूरी प्रजाती विलुप्त हो जाती है.
आज जीस तरह हम इन्सान टेक्नोलॉजी में आगे बढ़ते जा रहे हे वो भी एक कारन है पक्षिओ की प्रजाति खत्म होने के लिए. इन्टरनेट और मोबाइल के टावर से निकलने वाले किरण पक्षिओ के लिए प्राणघातक है.
ऊपर दिए गए सभी कारन पक्षिओ की प्रजाति विलुप्त होने का मुख्य कारन मनुष्य ही है. चलिए जानते है पक्षिओ की प्रजाति के बारे में जो विलुप्त हो चुकी है या होने वाली है.
Extinct Birds Facts in Hindi | दुनिया के कुछ विलुप्त पक्षी
चलिए जानते हे एसी ही कुछ पक्षिओ की प्रजातियो के बारे में जो विलुप्त हो गई है या होने वाली है.
आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx)

यह पक्षी दुनिया का सबसे पहेला पक्षी था जो धरती पर Prehistoric काल में मोजूद था जिसकी उत्पत्ति लगभग 15 करोड़ साल पहले जुरासिक काल के अंत में हुई थी। आर्कियोप्टेरिक्स पक्षी के पूरे विश्व में 12 से अधिक जीवाश्म (fossils) मिले हैं, जिनमें से अधिकांश जर्मनी के बवेरिया क्षेत्र में पाए गए हैं। इस पक्षी को आद्य या आर्कियोप्टेरिक्स कहा जाता है। इनमे से एक फॉसिल यूके के रॉयल म्यूजियम में तथा दूसरा फॉसिल राजस्थान यूनिवर्सिटी के महाराजा कॉलेज में रखा हुआ है।
आर्कियोप्टेरिक्स डायनासोर और आधुनिक पक्षियों के बीच की कड़ी माना जाता है इसके पंख तो थे लेकिन इसके जबड़े में दाँत भी थे, जो आधुनिक पक्षियों में नहीं पाए जाते। यह पक्षी पारिस्थितिकी (ecology) की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने वैज्ञानिकों को पक्षियों के विकासक्रम को समझने में मदद की है। दुनिया के सबसे बड़े और खतरनाक जानवर.
ड्रोमोनिर्स (Dromornis stirtoni)

500 से 600 किलो वजन वाला पक्षी ड्रोमोनिर्स ऑस्ट्रेलिया के विशिष्ट विशाल पक्षियों में से एक था जो डेढ़ करोड़ से 26 हजार वर्ष पूर्व तक के समय के मध्य मौजूद था. यह पक्षी दिखने में वर्तमान एमु की तरह दीखता था हालांकि यह पक्षी एमु जैसा था मगर पुर्णत: एमु नही था.
इस पक्षी को मिहिरंग पक्षी कहा जाता था. इनमे से कुछ वर्तमान एमु थोड़े बड़े थे पर स्तिटोनी 3 मीटर के करीब का था. यह धरती पर अब तक का सबसे भारी पक्षी माना जाता है जो उड़ नहीं सकता था। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और मनुष्यों के आगमन के बाद इसका भोजन समाप्त होने से यह विलुप्त हो गया।
डोडो पक्षी (Raphus cucullatus)
विलुप्त पक्षियों में डोडो सबसे प्रमुख है. डोडो (Raphus cucullatus) हिंद महासागर के द्वीप मॉरीशस का एक स्थानीय पक्षी था. यह उड़ानहीन पक्षियों में सबसे बड़े आकार का था. यह पक्षी कबूतर का नजदीकी रिश्तेदार था परन्तु इसकी ऊंचाई 3.3 फीट थी जबकि वजन करीब 20 किलो था. डोडो पक्षी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद ज़रूरी था क्योंकि यह Calvaria के पेड़ के बीजों को अपने पाचनतंत्र से गुजारकर उनके अंकुरण में मदद करता था डोडो के विलुप्त होने के बाद यह पेड़ भी लगभग विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया।
इस पक्षी की विलुप्ती का कारन भी हम इन्सान ही है. सन 1598 में डच समुद्री यात्री जब पहेली बार इस द्वीप पर आये तो उन्होंने इस पक्षी का शिकार करना शुरू किया क्यूंकि उड़ नहीं पाने की वजह से डोडो सबसे आशान शिकार था. इसी तरह डच यात्रिओ ने इस पक्षी की सारी प्रजातियो का शिकार कर दिया और यह पक्षी हमारी दुनिया से विलुप्त हो गए. डोडो पक्षी लगभग सन 1681 तक पूरी तरह विलुप्त हो चुका था — यानी यूरोपीय यात्रियों के आने के मात्र 80 साल के भीतर ही इस प्रजाति का सफाया हो गया।
तस्मानियन इमु (Tasmanian Emu)

तस्मानिया इमू, इमू पक्षी की ही एक प्रजाति है. यह पक्षी भी तस्मानिया टाइगर की तरह तस्मानिया द्वीप में ही पाई जाती थी, यह पक्षी उड़ नहीं पाता था, तस्मानिया में यह काफी तादाद में पाए जाते थे लेकिन बाद में वहा के किशानो ने तस्मानिया टाइगर की तरह ही इसे एक फसल को नष्ट करने वाला पक्षी मानते हुए इसका शिकार किया और लगभग सारे पक्षियों को मार डाला गया.
तस्मानियन इमु को आधिकारिक तौर पर सन 1850 के आसपास विलुप्त घोषित किया गया। यह इस बात का उदाहरण है कि किस तरह अज्ञानता और भय के कारण इंसान किसी पूरी प्रजाति को नष्ट कर देता है।
कैरोलिना पेराकीट (Carolina Parakeet)

कैरोलिना पेराकीट तोते की एक ऐसी प्रजाति थी जिसमे पंखो में अलग अलग रंग देखने को मिलते थे. इसके पंखो में शामिल हरे, लाल और पीले रंगो की वजह से यह बहुत आकर्षक लगता था.
कैरोलिना पेराकीट एकमात्र तोते की प्रजाति थी जो कि उत्तरी अमेरिका में पाई जाती थी, यह अलाबामा राज्य में मुख्य रूप से पाया जाता था लेकिन यह प्रवास करके ओहायो, आयोवा, इलिनॉइस आदि अमेरिका राज्यों में भी जाता था. यह पक्षी पारिस्थितिकी दृष्टि से महत्वपूर्ण था क्योंकि यह कॉकलबर जैसे जहरीले पौधों के बीज खाता था, जो अन्य जानवरों के लिए घातक होते हैं।
महिलाओं के लिए हैट बनाने के लिए इनका शिकार बड़ी मात्रा में किया गया था. जिससे इनकी संख्या लगातार कम होती चली गयी और आखिरी कैरोलिना पेराकीट की मौत सिनसिनाटी जू में सन 1918 में हो गयी थी. इसकी विलुप्ति IUCN की उस सूची में दर्ज है जिसे मानव-जनित विलुप्तीकरण का सबसे शर्मनाक उदाहरण माना जाता है।
अरबी शुतुरमुर्ग (Arabian Ostrich)

शुतुरमुर्ग पक्षी पहेले मध्य और पूर्व में पाया जाता था लेकिन अब सिर्फ अफ्रीका में ही पाए जाते हैं. पहले यह अरब के रेगिस्तान में भी पाए जाते थे. इसकी प्रजाति में इमू, किवी आदि गिने जाते है. यह पक्षी 70 किलोमीटर/घंटे की रफ़्तार से भाग सकता है.
अरबी शुतुरमुर्ग (Struthio camelus syriacus) का वैज्ञानिक नाम यह स्पष्ट करता है कि यह अफ्रीकी शुतुरमुर्ग की एक अलग उपप्रजाति थी जो मध्य-पूर्व के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनिवार्य थी।
अरब के अमीर लोगों ने खेल के रूप में इस पक्षी का शिकार करना शुरू किया, इस पक्षी का शिकार मास और अंडों उसके पंखों के लिए भी किया जाता था. इन्हें केवल मनोरंजन के लिए ही मारा गया इसका नतीजा यह निकला कि आज दुनिया से अरबी शतुरमुर्ग की पूरी प्रजाति ही खत्म हो गई है.
इस प्रजाति को आधिकारिक रूप से 20वीं सदी के मध्य में विलुप्त घोषित किया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों द्वारा वाहनों से किए गए शिकार ने इस प्रजाति के अंतिम बचे हुए पक्षियों को भी समाप्त कर दिया।
संदेश वाहक कबूतर (Passenger Pigeon)

पेसेंजर पीजन यानि की संदेश वाहक कबूतर कभी उत्तरी अमेरिका में भारी मात्रा में मोजूद थे. यह कबूतर हमारे भारतीय कबूतर की तरह ही थे लेकिन इसका रंग और आकार हमारे कबूतर से थोडा अलग था. यह कबूतर उत्तरी अमेरिका का के जंगल में पाए जाते थे.
19वीं सदी की शुरुआत में इन कबूतरों की संख्या 3 से 5 अरब के बीच आंकी गई थी. यह दुनिया में किसी भी पक्षी प्रजाति की अब तक की सबसे बड़ी आबादी में से एक थी।
बाद में उत्तरी अमेरिका में यूरोपीय देश के लोग आकर बसने लगे और सस्ते मांस के लालच में उन्होंने इनका शिकार करना शुरू कर दिया जिसके कारण इनकी संख्या धीरे धीरे कम होती गई. फिर भी यहाँ के लोग नहीं रुके और लगातार इसका शिकार करते गए और इसी तरह इसकी सारी प्रजाति विलुप्त हो गई.
इस तरह सिनसिनाटी चिड़ियाघर में मोजूद आखरी कबूतर मार्था की मोत (सन 1914) के साथ यह प्रजाति पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी. इस प्रजाति के विनाश का मुख्य कारन भी इन्सान ही है. पैसेंजर पीजन की विलुप्ति को आधुनिक संरक्षण आंदोलन की नींव माना जाता है — इसी घटना के बाद अमेरिका में पहली बार वन्यजीव संरक्षण कानून (Lacey Act) लागू किया गया।
गिद्ध पक्षी (Vulture)
गिद्ध एक शिकारी पक्षी हे जो बहोत ही विशाल है. यह हमारे आसपास की गन्दगी , मरे हुए जानवर का माँस आदि खा जाता है जिसकी वजह से हमारे आसपास गंदकी कम होती थी. लेकिन अब हमारे विकाश के चलते हमको गिद्ध देखने के नहीं मिलते है.
सन 1980 के दोरान में सिर्फ भारत में ही सफेद पूंछ वाले गिद्धों की संख्या करीब 80 मिलियन (800 लाख) थी जो की सन 2016 तक इनकी संख्या 40 हजार से भी कम हो गई थी.पिछली एक सत्ब्दी मे भारत, पाकिस्तान और नेपाल में गिद्ध की संख्या में 95 प्रतिसद कमी हो गई है.
भारतीय गिद्धों की आबादी में इस भारी गिरावट का मुख्य कारण डाइक्लोफेनेक (Diclofenac) नामक पशु-चिकित्सा दवा है — जो पशुओं को दी जाती थी और उनके मृत शरीर को खाने पर गिद्धों की किडनी फेल हो जाती थी। भारत सरकार ने 2006 में पशुओं में इस दवा के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया।
गिद्धों की संख्या में हुई कमी की वजह से वर्ष 2015 तक पर्यावरण स्वच्छता के लिए भारत में करीब 25 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च हुआ है. गिद्ध मुर्दाखोर पक्षी होते हैं जो बड़े पशुओं के शवों को खाते हैं और इसलिए पर्यावरण को साफ करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
IUCN ने भारतीय गिद्ध (Gyps indicus) को “Critically Endangered” यानी अत्यंत संकटग्रस्त प्रजाति की श्रेणी में रखा है। यदि अभी से ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह प्रजाति भी डोडो की तरह सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगी।
विलुप्त पक्षियों का Ecosystem पर प्रभाव
पक्षी केवल देखने में सुंदर नहीं होते, वे हमारे पर्यावरण की रीढ़ होते हैं। जब कोई पक्षी प्रजाति विलुप्त होती है, तो उसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) पर पड़ता है। पक्षी बीजों के प्रसार (seed dispersal), परागण (pollination), कीट नियंत्रण और खाद्य श्रृंखला को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, जब भारत में गिद्धों की संख्या घटी तो जंगलों में मृत पशुओं के शव सड़ने लगे, जिससे जलस्रोत दूषित हुए और बीमारियाँ फैलीं। BirdLife International के अनुसार, प्रत्येक विलुप्त पक्षी प्रजाति के साथ औसतन 90 अन्य प्रजातियाँ भी प्रभावित होती हैं। इसलिए पक्षी संरक्षण केवल एक प्राणी को बचाना नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को जीवित रखना है।
पक्षियों को बचाने के लिए क्या किया जा सकता है?
पक्षियों की विलुप्ती को रोकने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर प्रयास जरूरी हैं। IUCN, WWF (World Wide Fund for Nature) और BirdLife International जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पक्षी संरक्षण के लिए निरंतर काम कर रही हैं।
भारत में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) पक्षियों के संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाती है। हम सामान्य नागरिक के रूप में भी योगदान दे सकते हैं. जैसे कि कीटनाशकों का कम उपयोग करना, अपने घर के पास पक्षियों के लिए पानी और दाना रखना, वृक्षारोपण करना और वन्यजीव संरक्षण कानूनों का समर्थन करना। जो प्रजाति एक बार विलुप्त हो जाती है, वह फिर कभी वापस नहीं आती, इसलिए आज की जागरूकता ही कल की सुरक्षा है।
तो दोस्तों, इसी तरह हम इन्सानों के अत्याचार की वजह से, बे बुनियाद शिकार की वजह से, विकाश में चलते जंगलो का विनाश करने की वजहसे, रोज-रोज पक्षिओ की प्रजाति खत्म होती जा रही है. अगर हम कुछ भी नहीं करेगे और इस तरह पक्षिओ पर अत्याचार करते रहगे तो एक समय एसा आयेगा की पक्षिओ को भी हम डायनासोर की तरह सिर्फ टीवी में ही देख सकेंगे.
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
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अब तक कितनी पक्षी प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं?
IUCN की रेड लिस्ट के अनुसार, अब तक पक्षियों की 187 से अधिक प्रजातियाँ पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं। सन 1900 से अब तक लगभग 200 प्रजातियाँ इस धरती से समाप्त हो गई हैं और वर्तमान में 1,200 से अधिक प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर हैं।
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डोडो पक्षी कब और क्यों विलुप्त हुआ?
डोडो पक्षी लगभग सन 1681 तक पूरी तरह विलुप्त हो गया। सन 1598 में जब डच समुद्री यात्री मॉरीशस द्वीप पर पहुंचे, तो उन्होंने उड़ न पाने वाले इस पक्षी का बड़ी आसानी से शिकार किया। इसके साथ ही उनके साथ आए चूहे और सूअर जैसे जानवरों ने डोडो के अंडे नष्ट कर दिए, जिससे यह प्रजाति मात्र 80 वर्षों में पूरी तरह खत्म हो गई।
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पक्षियों के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण क्या है?
आवास विनाश, शिकार और मानव गतिविधियाँ पक्षियों के विलुप्त होने के सबसे बड़े कारण हैं।
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क्या भारत में भी पक्षियों की प्रजातियाँ विलुप्त हुई हैं?
हाँ, भारत में कई पक्षी प्रजातियों की संख्या अत्यधिक घट चुकी है और कुछ स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो चुकी हैं।
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गिद्धों की संख्या भारत में क्यों कम हुई?
पशुओं में उपयोग की जाने वाली डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) दवा को गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट का प्रमुख कारण माना जाता है।